एक गाँव था, जहाँ औरतों को हमेशा चुप रहने की शिक्षा दी जाती थी। लोग कहते, "औरत की जगह रसोई में है, और उसकी सीमा उसके शरीर तक है।"
लेकिन एक थी मीरा — शांत, मगर भीतर से तूफ़ान। वह पढ़ती थी, सोचती थी, और सवाल करती थी। गाँव के मर्द उससे डरते थे, क्योंकि वह सिर्फ सुंदर नहीं थी, समझदार भी थी।
मीरा कहती, "औरत दरअसल शरीर के पार है। तुम मुझे मेरे शरीर से नहीं समझ सकते।"
गाँव के एक आदमी ने उसकी इस बात से चिढ़कर एक दिन उसके शरीर पर हमला किया। वह सोचता था, "अब ये टूट जाएगी। हार जाएगी।"
लेकिन मीरा टूटी नहीं।
वह उठी, अपने ज़ख्मों को साफ किया, और गाँव की पंचायत के सामने खड़ी हो गई। उसने कहा,
"तुमने मेरा शरीर छुआ, मेरी आत्मा नहीं। तुम सोचते हो जीत गए, लेकिन असली हार तुम्हारी है। क्योंकि मैं वहां हूँ ही नहीं जहाँ तुमने हमला किया।"
मीरा की आवाज़ गूँजी, "मैं शरीर नहीं, सोच हूँ। मैं औरत हूँ — जो तुम्हारी समझ से बाहर है।"
गाँव की बाकी लड़कियाँ उसकी तरफ देखने लगीं। उन्हें भी पहली बार लगा कि वे सिर्फ शरीर नहीं, सोच हैं।
मीरा हारकर भी जीत गई।
क्योंकि असली औरत शरीर में नहीं, अपने दिमाग में होती है।
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